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Friday, 14 February 2014

केजरीवाल के इस्‍तीफे की धमकी के बीच दिल्‍ली विधानसभा में आज पेश होगा जनलोकपाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि यदि शुक्रवार को विधानसभा में जन लोकपाल विधेयक पारित नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. केजरीवाल जिस जनलोकपाल बिल को पेश करने पर आमादा हैं उस जनलोकपाल की राह में रोड़ा उस दिन आया जब उपराज्यपाल ने सॉलिसिटर जनरल से राय मांगी. पता चला दिल्ली के जनलोकपाल बिल के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी है. बस यहीं से दिल्ली सरकार बनाम केन्द्र की जंग शुरू हो गई.
केजरीवाल पूरी तैयारी कर चुके थे. अपने मंत्रियों के साथ बैठक कर जनलोकपाल बिल का महत्वाकांक्षी मसौदा बनाया. फिर पेश करने की बारी आई. केजरीवाल ने कहा जनता के सामने उनका जनलोकपाल पेश होगा. इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम से भ्रष्टाचार से मुक्ति का लोकपाल सामने आएगा. बीच में दिल्ली के उपराज्यपाल आ गए. उपराज्यपाल ने सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन से जनलोकपाल पर राय ली और उनकी राय को सार्वजनिक कर दिया कि दिल्ली का जनलोकपाल बिल केन्द्र की मंजूरी के बिना असंवैधानिक है. मीडिया ने खबर ने चलाई और केजरीवाल ने कलम. 7 फऱवरी को उन्होंने उपराज्यपाल को शिकायती खत लिख भेजा.
केजरीवाल ने खत में लिखा, ''जब मैंने टीवी चैनलों पर यह खबर सुनी तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा. क्योंकि उस बिल की कॉपी तो हमने आपको कल शाम को ही भेजी है. तो आपने किस बिल पर सॉलिसिटर जनरल की राय मांगी. उन्होंने भी आपको किस बिल पर राय दी। आपने कोई राय मांगी भी थी मुझसे चर्चा कर लेते. मैं आपको बिल की कॉपी दिखा कर सारी बातें समझा देता. लेकिन स़ॉलिसिटर जनरल की राय मीडिया में दे दी गई.'
खबर से खेल शुरू हुआ और जंग में बदलने लगा. दिल्ली के दावेदार और भारत की सरकार आमने सामने. उपराज्यपाल के पास दलील थी कि दिल्ली विधानसभा में किसी भी बिल को पेश करने से पहले केन्द्र की मंजूरी चाहिए, जबकि अरविंद केजरीवाल संविधान खंगालने लगे. लड़ाई लंबी होती गई. इस्तीफे तक जा पहुंची और केजरीवाल ने कह दिया कि जनलोकपाल के लिए सीएम की ऐसी सौ सौ कुर्सियां कुर्बान.
फिर केन्द्र ने एक नया शिगूफा छोड़ा कि स्टेडियम में जनलोकपाल पेश करते हुए 2 हजार लोगों की सुरक्षा देने में दिल्ली पुलिस नाकाम है. इस जंग में संविधान है, 2002 का गृह मंत्रालय की ओर से दिया गया आदेश है, दिल्ली विधानसभा के अधिकार हैं और केजरीवाल के वचन, उनकी नैतिकता है. कानून के जानकारों की भी अपनी अपनी राय है. इन सबसे ऊपर दिल्ली की विधानसभा है, जहां केजरीवाल जनलोकपाल बिल पेश करने वाले हैं

Monday, 10 February 2014

संसद में तेलंगाना पर हंगामे के बाद कार्यवाही स्‍थगित, सीमांध्र का विरोध जारी

तेलंगाना को लेकर संसद के दोनों सदनों में सोमवार को खूब हंगामा हुआ. तेलंगाना के खिलाफ सीमांध्र के सांसदों का विरोध लगातार जारी है. हंगामे के बाद दोनों सदनों की कार्यवाही मंगलवार तक के लिए स्‍थगित कर दी गई.
तेलंगाना बिल कैबिनेट से पास हो चुका है. सरकार का इसी सत्र में बिल पास कराने पर जोर है. वैसे संसद में हंगामे की वजह से कई अहम बिल पहले से ही अधर में लटके हैं.
बिल पेश करने के लिए राष्‍ट्रपति की मंजूरी जरूरी
संसद में तेलंगाना विधेयक पेश करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा की गई सिफारिश रविवार को प्रधानमंत्री कार्यालय के मार्फत राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेजी जा चुकी है. आंध्र प्रदेश के विभाजन के लिए राज्य पुनर्गठन विधेयक के मंगलवार को संसद में पेश होने की संभावना है.
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'राष्ट्रपति की मंजूरी सोमवार को मिलने की संभावना है. हम संसद में मंगलवार को विधेयक पेश करने की योजना बना रहे हैं.'
केंद्रीय कैबिनेट से मिल चुकी है मंजूरी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आंध्र प्रदेश के विभाजन के जरिए तेलंगाना के गठन के लिए मसौदा विधेयक को शुक्रवार को मंजूरी दी थी. राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक को खारिज करने के बावजूद ऐसा किया गया.
तेलंगाना विरोधी सदस्यों के विरोध के बीच सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं. तेलंगाना का विरोध करने वालों में कांग्रेस सदस्य भी शामिल हैं. यह विधेयक राज्यसभा में इसलिए पेश किया जा रहा है, क्योंकि ऐसा लगता है कि सरकार इसे लोकसभा भंग होने के बावजूद अस्तित्व में बनाए रखना चाहती है. उच्च सदन में पेश और इसके द्वारा पारित नहीं किया गया विधेयक लाइव रजिस्टर में बना रहता है.
बिल के स्‍वरूप में बदलाव नहीं
समझा जा रहा है कि विवादास्पद विधेयक को उसी स्वरूप में राज्यसभा में पेश किया जाएगा, जैसे कि उसे आंध्र प्रदेश विधानसभा में भेजा गया था. हालांकि केन्द्र सरकार इस विधेयक को विचार के लिए रखे जाने के समय इस पर 32 संशोधन पेश करेगी.
प्रस्तावित तेलंगाना विधेयक में हैदराबाद को केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा प्रदान नहीं किया गया है, हालांकि इसे लेकर काफी मांग की जा रही थी. इस बिल में रायलसीमा व उत्तरी तटीय आंध्र के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा की जा सकती है, ताकि वहां के लोगों की चिंताओं को दूर किया जा सके. कैबिनेट ने काफी लंबे विचार-विमर्श के बाद आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को मंजूरी दी थी. इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक हुई.
मौजूदा लोकसभा का अंतिम सेशन
पन्द्रहवीं लोकसभा का मौजूदा सत्र अंतिम होने के कारण सरकार चाहती है कि सेशन के दौरान ही चर्चा कराकर इसे पारित करवाया जाए. सरकार ने इस विधेयक को ऐसे समय में संसद की मंजूरी दिलवाने का निर्णय किया है, जब आंध्र प्रदेश विधानसभा इसे खारिज कर चुकी है तथा कांग्रेस के सीएम किरण कुमार रेड्डी राज्य के प्रस्तावित विभाजन का विरोध कर रहे हैं. रेड्डी ने दिल्‍ली में धरना भी दिया था और राज्य के विभाजन को रोकने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर उनसे हस्तक्षेप करने की मांग की थी.